जिला कारागार हरिद्वार में गंगा कथा: भीष्म जन्म के मार्मिक प्रसंगों से बंदियों को मिला नया जीवन मार्ग
हरिद्वार की जिला कारागार में इन दिनों आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है। श्री अखंड परशुराम अखाड़े के तत्वावधान में आयोजित ‘गंगा कथा’ के तीसरे दिन कथाव्यास आचार्य कृष्ण शास्त्री ने महाभारत के महत्वपूर्ण पात्र भीष्म पितामह के जन्म से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का श्रवण कराया। इन मार्मिक कथाओं ने कारागार में निरुद्ध बंदियों की मनोदशा पर गहरा सकारात्मक प्रभाव डाला, उन्हें आत्मचिंतन और सुधार की दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
भीष्म जन्म और देवी गंगा के अलौकिक प्रसंग
कथा के तीसरे दिन आचार्य कृष्ण शास्त्री ने श्रोताओं को देवी गंगा और राजा शांतनु के दिव्य विवाह से परिचित कराया। उन्होंने उन घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया जब वसुओं ने वशिष्ठ ऋषि की नंदिनी गाय चुरा ली थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें ऋषि के क्रोध और श्राप का सामना करना पड़ा। आचार्य शास्त्री ने बताया कि कैसे देवी गंगा ने आठ वसुओं को इस श्राप से मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया। कथा के दौरान उन्होंने सात पुत्रों को जन्म लेते ही जल में प्रवाहित करने के हृदयविदारक प्रसंग का वर्णन किया, जिसका उद्देश्य वसुओं को श्राप से मुक्ति दिलाना था।
आठवें पुत्र, देवव्रत, को जीवित रखकर उनके भीष्म बनने की अद्भुत कहानी सुनाई गई। भीष्म की आजीवन ब्रह्मचर्य और राज्य त्याग की भीषण प्रतिज्ञा, जिसने उन्हें ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ के नाम से अमर कर दिया, ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। आचार्य शास्त्री ने बताया कि कैसे भीष्म ने अपने पिता के सुख के लिए ऐसे कठोर व्रत लिए, जो त्याग, बलिदान और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक बन गए।
बंदियों पर आध्यात्मिक कथा का सकारात्मक प्रभाव
इस आध्यात्मिक आयोजन के प्रमुख संयोजक श्री अखंड परशुराम अखाड़े के अध्यक्ष पंडित अधीर कौशिक ने गंगा कथा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि श्रावण मास में मां गंगा की अमृत कथा का श्रवण कारागार में निरुद्ध बंदियों की मानसिकता पर अत्यंत सकारात्मक असर डालेगा। पंडित कौशिक ने विश्वास व्यक्त किया कि ये कथाएं बंदियों को अपराध का मार्ग छोड़कर समाज और देश की उन्नति में अपना योगदान देने के लिए प्रेरित करेंगी। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे आयोजन न केवल बंदियों का आध्यात्मिक उत्थान करते हैं, बल्कि उन्हें एक बेहतर नागरिक बनने का अवसर भी प्रदान करते हैं।
धर्म और सत्संग ही दिखाते हैं सही राह
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित निरंजनी अखाड़े के सचिव स्वामी रामरतन गिरि महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि मां गंगा की कथा सुनने से समस्त पाप नष्ट होते हैं। उन्होंने मानव जीवन में कथा और सत्संग के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ये ही मानव को सही मार्ग दिखाते हैं और उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। स्वामी रामरतन गिरि ने आज के युग में धर्म से जुड़कर ही समाज के कल्याण की संभावना व्यक्त की।
वहीं, स्वामी रविदेव शास्त्री ने गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि ‘मोक्षदायिनी’ बताया। उन्होंने कहा कि गंगा तट पर कथा श्रवण करने से मन को अद्वितीय शांति और सद्बुद्धि प्राप्त होती है। यह अवसर आत्मशुद्धि और आंतरिक विकास का अनुपम साधन है, जो हर व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए मानसिक शक्ति प्रदान करता है।
कथा के यजमान और गणमान्य उपस्थित
इस पुण्य कथा के यजमानों में जलज कौशिक, सत्यम शर्मा, स्वामी ज्योतिर्मयानंद, स्वामी रूद्रानंद सरस्वती, बृजमोहन शर्मा, बंटी कुमार, चौधरी बलविंदर, पंडित कृष्ण शर्मा और अमित कुमार प्रमुख रूप से मौजूद रहे। उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया। इस तरह के आयोजनों से समाज में सद्भाव और आध्यात्मिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो जीवन के कठिन दौर से गुजर रहे हैं।
